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The Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989

बुधवार, 5 जुलाई 2023

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (PoA Act) भारत की संसद का एक अधिनियम है जो अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के सदस्यों के खिलाफ भेदभाव को रोकता है और उनके खिलाफ अत्याचार को रोकता है। समानता और गैर-भेदभाव की संवैधानिक गारंटी के बावजूद, इन समुदायों द्वारा सामना किए जा रहे निरंतर भेदभाव और अत्याचारों के जवाब में यह अधिनियम लागू किया गया था।


PoA अधिनियम विभिन्न प्रकार के कृत्यों को अत्याचार के रूप में परिभाषित करता है, जिनमें शामिल हैं:


शारीरिक हिंसा: इसमें हमला, हत्या, बलात्कार, अपहरण और अन्य प्रकार की शारीरिक क्षति शामिल है।

मानसिक और भावनात्मक शोषण: इसमें मौखिक दुर्व्यवहार, धमकियाँ, डराना और मनोवैज्ञानिक क्षति के अन्य रूप शामिल हैं।

आर्थिक शोषण: इसमें जबरन श्रम, बंधुआ मजदूरी और आर्थिक शोषण के अन्य रूप शामिल हैं।

मौलिक अधिकारों से वंचित: इसमें शिक्षा, रोजगार, आवास और अन्य मौलिक अधिकारों तक पहुंच से इनकार शामिल है।

पीओए अधिनियम एससी और एसटी के खिलाफ अत्याचारों को रोकने और दंडित करने के लिए विशेष उपायों का भी प्रावधान करता है। इन उपायों में शामिल हैं:


विशेष अदालतें: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के खिलाफ अत्याचार के मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें स्थापित की जाती हैं। इन अदालतों के पास इन मामलों पर विशेष क्षेत्राधिकार है, और उन्हें कड़ी सजा देने का अधिकार है।

कोई अग्रिम जमानत नहीं: एससी और एसटी के खिलाफ अत्याचार के मामलों में अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं है। इसका मतलब यह है कि अभियुक्तों को उनके मुकदमे से पहले जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता है।

फास्ट-ट्रैक सुनवाई: एससी और एसटी के खिलाफ अत्याचार के मामलों की सुनवाई फास्ट-ट्रैक आधार पर की जानी चाहिए। इसका मतलब यह है कि मुकदमा एक निश्चित समयावधि के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।

PoA अधिनियम एससी और एसटी के खिलाफ भेदभाव और अत्याचार के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम रहा है। हालाँकि, अधिनियम के कार्यान्वयन में अभी भी चुनौतियाँ हैं। इन चुनौतियों में शामिल हैं:


जागरूकता की कमी: पीओए अधिनियम के बारे में आम जनता और पुलिस दोनों के बीच जागरूकता की कमी है। इससे अत्याचार के मामलों की ठीक से रिपोर्ट या जांच नहीं की जा सकेगी।

पुलिस की उदासीनता: एससी और एसटी के खिलाफ अत्याचार के मामलों की जांच में कभी-कभी पुलिस की ओर से उदासीनता होती है। यह कई कारकों के कारण हो सकता है, जैसे जातिगत पूर्वाग्रह या पीओए अधिनियम पर प्रशिक्षण की कमी।

न्याय में देरी: मुकदमे की प्रक्रिया धीमी और बोझिल हो सकती है, जिससे अत्याचार के पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी हो सकती है।

इन चुनौतियों के बावजूद, पीओए अधिनियम एससी और एसटी के खिलाफ भेदभाव और अत्याचार के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण उपकरण है। इस अधिनियम ने इन अपराधों के पीड़ितों को कुछ हद तक न्याय दिलाने में मदद की है, और इसने संभावित अपराधियों के लिए निवारक के रूप में भी काम किया है।

हाल के वर्षों में, पीओए अधिनियम में संशोधन के लिए कुछ मांगें उठी हैं। ये कॉल कुछ लोगों द्वारा अधिनियम के दुरुपयोग के बारे में चिंताओं के जवाब में की गई हैं। हालाँकि, एससी और एसटी के अधिकारों की रक्षा और अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है। पीओए अधिनियम में किसी भी संशोधन पर सावधानीपूर्वक विचार किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह अधिनियम इन समुदायों के खिलाफ भेदभाव और अत्याचारों के खिलाफ लड़ाई में एक प्रभावी उपकरण बना रहे।

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आलोर अभियात्री नाम की एक स्वयंसेवी संस्था चाय श्रमिकों को सेवा प्रदान करने के लिये आगे आयी।

मंगलवार, 10 जनवरी 2023

9 जनवरी 2023, मालबाजार/ प•ब• - जलपाईगुड़ी जिला के क्रांति प्रखंड कैलाशपुर चाय बागान के सउतालपुर चाय बागान में मैनागुड़ी आलोर अभियात्री नाम की एक स्वयंसेवी संस्था चाय श्रमिकों को सेवा प्रदान करने के लिये आगे आयी। संस्था के तरफ़ से चाय बागान में 100 से अधिक श्रमिकों को सर्दी के कपड़े बांटे। 

 संस्था की ओर से सुमिता दास ने कहा हम हर साल जिले के विभिन्न हिस्सों में जरूरतमंद लोगों को जितना संभव हो सके सर्दियों के कपड़े वितरित करतें हैं । स्थानीय चाय बागान के कर्मचारी जगन्नाथ अधिकारी ने मैनागुड़ी आलो अभियात्री का इस पहल को सराहना किया । उन्होंने क्षेत्र में चाय बागान के श्रमिकों को सर्दियों के कपड़े देने के लिए संगठन को धन्यवाद दिया। इस मौके पर संस्था की ओर से पिंटू सेन एवं प्रमुख समाजसेवी जग नाथ अधिकारी, अहसन हबीब, सेलुकास सलीम, अनिर्बन सरकार, दीपक भौमिक, मुमताज बेगम, फिरोज खान आदि मौजूद रहे। चाय श्रमिक सर्दियों के कपड़े पाकर बेहद खुश दिखें ।
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जलपाईगुड़ी जिला के सुपर स्पेशलिटी हस्पताल के एक एम्बुलेंस चालक द्वारा मृतक परिवार के साथ शव ले जाने पर सौदेबाजी।

5 जनवरी 2023, जलपाईगुड़ी/पश्चिम बंगाल: जलपाईगुड़ी जिला के सुपर स्पेशलिटी हस्पताल के एक एम्बुलेंस चालक द्वारा मृतक परिवार के साथ शव ले जाने पर सौदेबाजी। 

एंबुलेंस चालक ने कहा कि शव को शव वाहन में ले जाना है तो 3000 रुपये देने होंगे।  
लेकिन मृतक के परिवार वालो के पास इतने पैसे तो थे नही की एम्बुलेंस चालक को दे पाते इसलिए 
मृतक के परिवार वालो ने 900 रुपये से लेकर 1200 रुपये देने की बात कही लेकिन एंबुलेंस चालक बिल्कुल भी नहीं माना।  

और अगर 3000/- रुपये का रकम नही मिला तो एंबुलेंस चालक जलपाईगुड़ी जिले के अंतर्गत क्रांति नामक मृतक के गाँव में मृत परिवार को पहुंचाने के लिए  तैयार नहीं हुआ। 

कोई और रास्ता न पाकर बेटे ने अपने बूढ़े पिता के साथ अपनी माँ के शव को अपनी बाँह में लेकर जलपाईगुड़ी मेडिकल कॉलेज सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल से रवाना हो गया अपने घर के लिए।

बेटे के कंधे पर मृत माँ का सिर और पैरो का भाग मृत महिला के पति के कंधे पे। 

यह दोनों चल पड़े लगभग 50 किलोमीटर की पैदल यात्रा पर ताकि अपनी मां  का अंतिम संस्कार और क्रिया कर्म अपने ही गांव ले जाकर कर सके। 

जलपाईगुड़ी अस्पताल से क्रांति की दूरी करीब पचास किलोमीटर है।

सुबह  करीब 10.30 बजे शव ले जाने के इस भयानक मंजर से कई लोग अचंभित हो गए हैं । 

हालांकि मेडिकल कॉलेज अस्पताल में नि:शुल्क सेवाएं मिलने की व्यवस्था है, लेकिन प्रबंधन पर सवाल उठते रहे हैं। 
आम लोगो काभी आरोप है कि इस अस्पताल मे ऐसी घटनाए आये दिन घटती रहती है। 
अस्पताल के भीतर निजी एंबुलेंस लेकर जाने भी नही देते।
ऐसी धांधली को बंद करने की मांग की लोगो ने।
इसके साथ ही इन्सान को शर्मसार करने वाली इस घटना का पद्मभूषण से सम्मानित एम्बुलेंस दादा (करिमुल हक )ने भी खुब निंदा की।




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